तब मुझे इंसाफ मिल जायेगा……



“ नहीं चाहिए मुझे मोम्बतियों की शांति,

जलन होती है मुझे,

नहीं चाहिये दिलाशा आपका,

कुछ हाशिल नहीं होता मुझे,

रोक लेना खुद को सच की रहा भटकने से,

रोक लेना खुद को कुछ गलत करने से,

मुझे इंसाफ मिल जायेगा ।

देख कर ये झूठे चेहरे,

घुटन होती है मुझे,

आज भी गूंजती है
वो चीखे मेरे कानो में,

रोक लेना खुद को हैवान बनने से,

मुहे इंसाफ मिल जायेगा ।

आहट भी डरा जाती है मुझे,

आकेली पड़ गयी थी इस जन्हा में,

मत पड़ने देना किसी और को अकेला,

तब मुझे इंसाफ मिल जायेगा ।

नहीं चाहिये लिबाज ऐसा…जो केवल मेरे तन को ढँक ले,

अपने मन के पाप को जब तुम साफ़ कर लेना,

गलत सही के अंतर को जब मन में धारण कर लेना,

तो मुझे इंसाफ मिल जायेगा,

अगर ना कर पाए इतना तुम,

तो मोमबतियाँ ना जलाना,

रूह जलती है मेरी….

बची इंसानियत जलती है तेरी…

रौशनी मिलती है बुराई को ….

अच्छाइयां डरती है तेरी….।।“

©Amresh mishra


 

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